TRICARE Logo

TRICARE® FOR LIFE

Benefits Administration Portal

Antarvasna Hindi Story New | Exclusive

कहानी का अंत किसी निश्चालित विजय से नहीं होता—बल्कि एक नए आरम्भ से होता है। अंजलि की antarvasna पूरी तरह से खत्म नहीं हुई; पर उसने उसे समझ लिया—वो अब एक धधकती जरनल नहीं, बल्कि एक दिशासूचक रोशनी थी। और शायद यही सच है: भीतर की तपन हमें जलाकर मिटाने की नहीं, बल्कि रोशनी देकर रास्ता दिखाने की क्षमता देती है—बस हमें आँखें खोलकर सुनना आना चाहिए।

वापसी पर अंजलि की सोच चल पड़ी। 'पहचानना'—क्या उसे अपने भीतर की चाह का नाम देना चाहिए? वह रातों को जागकर अपने एक-एक ख़याल को याद करती। कभी उसे लगता कि वह किसी शहर की बड़ी लाइब्रेरी में काम करना चाहती है, जहाँ रोज़ नए-नए लोग आते और वह उनके साथ किताबों के बारे में बातें करती; कभी लगता कि शायद उसकी चाह किसी रिश्ते की ओर इशारा करती है—किसी के साथ घुलकर रहने की सरल सी तमन्ना। कभी-कभी वह सिर्फ़ सलाह चाहती थी—किसी से खुलकर बातें करने की। antarvasna hindi story new

समय के साथ उसकी अंदरूनी बेचैनी का स्वर बदल गया—वह अब अधिक प्रश्न नहीं पूछती थी "क्यों?" बल्कि कहती थी "कैसे?" कैसे मैं खुद को और बेहतर बनाऊँ? कैसे मैं अपनी चाह को शब्द दे कर दूसरों तक पहुंचाऊँ? इस बदलाव ने उसे और अखंड बना दिया। उसने एक छोटी सी कहानी पाठिका समूह शुरू की—गाँव के बच्चों के लिए रविवार को पढ़ने का सेशन। शहर के कुछ आवासीय इलाकों में रहने वाले लोग भी आते; उन्हें अंजलि के सरल, स्नेही अंदाज़ से बातें करना अच्छा लगा। उसने महसूस किया कि उसकी antarvasna अब किसी कमजोरी का संकेत नहीं बनकर उसे सृजन की ओर धकेल रही है। उन्हें अंजलि के सरल

शब्दों के साथ-साथ उसकी बेचैनी कुछ बदली; उसे अपने भीतर के रंग दिखने लगे। हर लिखे पन्ने पर वह एक छोटी-छोटी हिम्मत जोड़ती। उसने महसूस किया कि antarvasna सिर्फ़ दर्द नहीं; उसमें इच्छा भी थी—जीवन को एक अलग रूप देने की। अब वह इसे छुपाने नहीं चाहती थी, बल्कि समझना चाहती थी। किसी के लिए साथी की खोज

कभी-कभी उसे अभी भी रातों में वही पुरानी बेचैनी छू जाती, पर अब वह डर से नहीं बल्कि किसी खबर की तरह महसूस करती—कोई संदेश, जिसे सुनकर उसे अपना अगला कदम उठाना है। उसने जाना कि हर मनुष्य की antarvasna अलग होती है—किसी के लिए वह कला की चाह है, किसी के लिए साथी की खोज, किसी के लिए बस समझने की कठिनाई; पर एक बात समान है: उसे मानकर, उसे लिखकर और उसके साथ काम करके उसे आकार दिया जा सकता है।

वह गाँव के किनारे बने छोटे-से घर में रहती थी। खिड़की से दूर क्षितिज पर खेतों की कतारें और कभी-कभी गुजरते यात्रियों की सर्द-गरम आवाज़ें दिखाई देतीं। अंजलि को पढ़ने का बेहद शौक था; उसने गाँव के एक स्कूल में पढ़ना पूरा किया और किताबों के छोटे-छोटे टुकड़ों में दुनिया तलाश ली। पर किताबें सिर्फ़ उसके दिमाग़ को पोषित करतीं—उसके दिल की उस गुनगुनाहट को नहीं बुझा पातीं जो दिन के मध्यविराम पर अचानक लौट आती थी।